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राजघाट बंद

चुँकि #गांधी_के_राम अलग थे और #हिन्दुत्व_के_राम अलग. इसीलिए राजघाट को बंद कर गांधी स्मृति और दर्शन समिति में #राम_मंदिर_निर्माण_की_बैठक की गई. यार क्या फलसफे है तुम्हारे…
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गांधी क्या है केवल शब्द, विचार या इंसानियत की वो पहचान जो समय-समय पर हमारे होने को कचोटता है. यह एक भाव पैदा करता है कि केवल भारतीयता ही नहीं दुनियावी हकीकत भी जिन्दा है. जिनके होने का एहसास कभी डिगता नहीं और न ही किसी के खात्मा को अपना मंजिल बनाता है. उनकी हत्या भले ही सत्तर साल पहले की गई हो. लेकिन आज भी उनके नाम, विचार और एहसास को मारने की रवायत समय-समय पर जारी है. यह सिलसिला कभी इंसानी देह को ख़त्म करने में तो कभी इंसानी वजूद को हिला देने में लगातार लगा है पर हुआ क्या सभी के सामने है.
सच पूछा जाए कि इन सबसे हुआ क्या? क्या किसी संस्थानिक प्रयास या धार्मिक प्रपंच का शिकार वो हो पाये? क्या इतनी ही कमजोर थी उनकी नीव. नहीं! मेरी समझ तो बस इतनी ही कहती है कि न ये पहले संभव था जब 1935 से लगातार प्रयास के बाद यह सम्भव हो पाया, न ही 1942 के बाद, न ही 1947 के बाद और न ही 30 जनवरी 1948 के 5 बजकर 17 मिनट के बाद ही. भले ही उस समय देह ने साथ छोड़ दिया हो पर इतना तो जरूर हुआ कि इंसानियत की आवाज़ जो गांधी में जब्त थी वो और भी मुखर होकर हर किसी के अंदर समा गई जो समय-समय पर हम-आपके बीच हुंकार मारती है.
भले ही आज कल का दो दिना #राजघाट_बंद किसी के सत्ता प्रतिष्ठान पर काबिज होने का संकेत मात्र हो. पर मैं तो इतना ही कहना चाहुन्गा – “ऐसी घटनाएं बार-बार हमारे अंदर के गांधी को जिन्दा करने के लिए ही काफी है.” सच में राजघाट वो जगह है जहां लोग जाकर गांधी के रूह से खुद का साक्षात्कार करते हैं. जो हमारे लिए हमारे अहिंसक होने को और भी प्रबल बनाता है. यह जगह अपने विरोधियों के बीच जाकर या बुलाकर एक बार फिर बात करने का साहस देता है. एक उम्मीद बांध देता है कि एक बार नहीं बल्कि बार-बार सत्य से साक्षात्कार किया जाए. उसके असहमति पर विचार कर वो रास्ता ईज़ाद किया जाए कि वो मुझे समझ पाये और मैं भी उसे उतना ही समझ पाऊ. हम वैसा नहीं कि किसी के नफरत का प्रतिकार उसी के रूप में कर सकें बल्कि हम वैसे हैं जो उसके अंदर के नफरत को कम करने के लिए जो भी कोशिश हो वो कर सकेंगे.
भले ही राजघाट पहली बार दो दिनों के लिए बंद कर दिया गया हो पर मुझे राजघाट की हवा में दिखाई देता है कि वो मानो कह रही हो कि “भाई आप अपना मंथन बड़े ही शान से करो और उसमें हमारे कारण कोई कमी न आये. तुम भलीभान्ति सोचो, समझो और वही करना जो तुम्हारे लिए भी उतना ही उचित हो. इंसान, धर्म और समय जरूर आते-जाते रहते हैं लेकिन अगर खुद का सच्चे और सकारात्मक होने का विश्वास उठ गया तो तुम क्या तुम्हारा कोई भी कुछ नहीं कर पायेगा…”
-कार्तिकेय

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