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गांधी 70

राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक आकाओं को
हमने घरियाली आहें भरते देखा है.
हाँ ! अपने अंदर के गांधी को पल-पल मरते देखा है…

उम्मीद के मोती सर से सरकते
पैरों पे टपकते देखा है.
हाँ ! अपने अंदर के गांधी को पल-पल मरते देखा है…

सांप्रदायिक उन्माद को फलते-फूलते
इंसानियत को दिन-रात तड़पते देखा है.
हाँ ! अपने अंदर के गांधी को पल-पल मरते देखा है…

खुदगर्जी के पागल-दौड़ सजाते देखा है
हमने बेशर्मी का उफान उबलते देखा है.
हाँ ! अपने अंदर के गांधी को पल-पल मरते देखा है…
-कार्तिकेय

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