अस्तित्व का संकट

अंधेरे की काली खौफनाक छटा
घनघोर रात के मानिंद
चारों तरफ फैल गई

फैल गए हैं दुख, प्रतिकार, निराशा के बादल
कुन्ध हो गए हैं सारे सपने
विचारहीन हो गए हैं अपने ही पथ
सामाजिक, पारिवारिक क्या व्यक्तिगत
अब तमाम आजादी भी ख़तरे में है

ख़तरे में है पक्षियों की चहचहाहट
कुत्तों का भौंकना
गाय, भैंस का रँभाना
और जारी है पशुओं, बीमार वृद्ध का रूदन

केवल एक रात की सुगबुगाहट है
हाँ बस एक रात
दिवाली की रात
और
दिवालियापन लिए मेरा-तुम्हारा, इसका-उसका
हम सभी का बेचैन मन

ख़त्म हो जाएगा,
ये सालाना सिलसिला आज रात ढलते-ढलते
लेकिन अपंग हो जाएंगे
इस कायनात के अधिकांश जीव-जंतु…
-कार्तिकेय

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