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कैसा दुःख ?

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दुःख है, 

अपनी परम्पराओं के टूट जाने का. 

दुःख है, 

अनायास वर्चस्व के छीन लिए जाने का. 

दुःख है, 

सबके समान हो जाने का. 

दुःख है, 

दकियानूसी 

परंतु अपनी वर्चस्ववादी पारम्परिक विरासत 

ब्राह्मणवाद के मर जाने का.

दुःख है, 

हाँ! बहुत दुःख है!

औरों के समझदार हो जाने का.

                                 – कार्तिकेय

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कहानी आंदोलन : कल और आज

कथा-कहानी का कहानी पाठ और परिचर्चा मेरे लिए बहुत कुछ सीखने समझने से लबरेज़ था. वो पैमाने जो हमने कथा साहित्य और उनके आंदोलनो के जरीये पाया है, वो किस प्रकार प्रेमचन्द की परम्परा से आगे बढकर आज तक पहुंचा. इन सभी बिन्दुओं को रमेश उपाध्याय सर ने एक शानदार अनाम कहानी के माध्यम से हमें समझाने की कोशिश की. वो कहानी इस प्रकार थी – एक ऐसी जगह और एक ऐसा स्वप्नलोक, जहां के लोगों का न ही कोई नाम था और न ही काम. इसके बारे में किसी के पूछने पर वो इसका जवाब बस इतना ही दे पाते कि नाम, जो आप कह लो और काम, जो आप करवा लो. यह एक सांकेतिक कहानी थी जो हिन्दी साहित्य की परम्परा और आधुनिक विकास का पर्याय था, जिसे हमारे पुरोधा साहित्यकार ने अपने पाश्चात्य नामों के बदलाव भर से अपनाया था. वो कभी अकहानी के रूप में, तो कभी समांतर कहानी के रूप में, तो कभी नई कहानी के रूप में, तो कभी युवा कहानी के रूप में. परंतु सच में स्ट्रेक्चर, कथ्य, शिल्प के तौर में जो बदलाव बताया गया वो लगभग बेमानी ही था, जो एक समय के बाद इन आंदोलित स्वर की भाषा और पैमाने वैसे ही बुझ गए. रह गया तो केवल कहानी में कथ्य व भाव की सम्वेदना जो अपने शिल्प के माध्यम से आज भी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है. आज भी कई पैमाने हैं जबकि परिस्थितियाँ आज यह है कि साथ मिलकर एक साहित्यिक सामाजिक आंदोलन को रूप दिया जाए. उसे दलित, स्त्री, OBC, आदिवासी, आदि पैमानो में न बांटकर साहित्य, समाज और संस्कृति के आज के सवाल को सम्मिलित रूप से अपने रचनात्मक प्रयास के साथ आगे बढाया जाए. अगर आज भी भोगा हुआ यथार्थ अगर साहित्य की कसौटी है तो मेरा सवाल है साहित्यकार की समझदारी का होना क्या सवाल के दायरे में नहीं आता ? क्या वह स्वच्छन्द होकर अपने पात्र और उसकी समस्याओं को नहीं गढ़ सकता ? क्या ये सवाल भी पैदा नहीं होते हैं कि जिस प्रकार दलित, स्त्री, आदिवासी, OBC व्यक्ति दलित साहित्य, स्त्रीवादी साहित्य, आदिवासी साहित्य, OBC साहित्य की रचना का उत्तरदायी माना जाएगा तो क्या इसी तरह से समीक्षक, पाठक और श्रोता भी इसी घेरे में नहीं आयेंगे. अगर इस तरह के खेमे में बांटना साहित्य का वर्तमान उद्देश्य है तो प्लीज़ एक बार रूक कर जरूर सोचे. यह कोई प्रगतिशीलता नहीं बल्कि एक धोखा है, जो साहित्य के उद्देश्य से आपको भटका रहा है…
अब्दुल बिस्मिल्लाह सर की कहानी ‘खून’ और प्रग्या मैम की कहानी ‘स्याह घेरे में’ की प्रतिक्रिया अगले हिस्से में.

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बेरोजगारी डायरी 01

दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षित बेरोजगारो (शिक्षा के क्षेत्र में आने वाले महारथियों) के बीच एक नई लकीर जल्दी ही खिंचने वाली है. और मुझे लगता है कि इसे जितना जल्दी हो खिंच देनी चाहिए. देखा जाए तो हमारे विश्वविद्यालय में असिस्टेन्ट प्रोफेसर के तौर पर चार प्रकार के बेरोजगार मौजूद हैं :-
01. अति सामान्य बेरोजगार
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वो बेरोजगार जिनका शिक्षा के क्षेत्र में, राजनीति में और प्रशासन में सुनने वाला कोई मां-बाप नहीं होता. वो हमेशा दर-दर पर फोर्म भरते फिरते हैं. हो सकता है कि वो दिल्ली विश्वविद्यालय के परमानेन्ट के लिए पिछले बार फोर्म भरा हो, जिसके लिए उसे 500-500 रूपये के हिसाब से अगर 40-50 कॉलेज में फोर्म भरे हो तो 20000-25000 रूपये तक का दक्षिणा हर बार अदा करना होता है. वैसे तो ये बात चारों कैटोगरी के बेरोजगारो के लिए उतना ही सच है. पर यह जो सामान्य बेरोजगार है, वो केवल परमानेन्ट के लिए ही सही से फाईट कर पाते हैं.
इस तरह के बेरोजगार की दुविधा साहब ये होती हैं कि इन्हें पी-डी.एफ., पी-एच.डी., एम.फिल., एम.ए., नेट, जे.आर.एफ. सब क्लियर करने के बावजूद SOL (स्कुल ऑफ़ ओपेन लर्निंग), Non collegiate (नोन कॉलेजियेट), IGNOU (इग्नू) आदि तक में हर बार फोर्म भरने पर अगले साल की दुहाई दे दी जाती है. जबकि इसका एक ही एलिजिबलिटी प्रक्रिया है किसी भी रसूखदार प्रभावशाली इंसान से आप फोन करा दीजिए. जो सीट चंद सेकेण्ड पहले फूल थी, वो एक आपके हिस्से में चली जायेगी. लेकिन मासाअल्लाह वो फोन सामान्य बेरोजगार के लिए करे कौन. अगर ये बात हर तरह के बेरोजगारो के बीच उठे तो कोई भी अतिसामान्य सा जवाब दे बैठता है. क्या डाक्टर साहब रिसर्च पूरे हुए आपके सात-आठ साल हो गए और आप इतना भी जान-पहचान नहीं बना पाए.

02. सामान्य बेरोजगार
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ये महानुभाव वो होते हैं जो अपनी अतिसामान्यता का अधिकार खो चुके होते हैं. इन्हें किसी कॉलेज में पीरियड दर पीरियड के हिसाब से काम मिल चुका होता है. और लगता है कि यहां उच्चतर शैक्षिक समाज ने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी हो. अब इसके एवज में इन्हें हिदायत दी जाती है कि वो अपनी प्रतिक्रिया की पेटी बंद ही रखें. ये हर तरह के अधिकार-वधिकार वाले शब्द और आन्दोलन-फान्दोलन से जितना बच कर रहे उतना ही अच्छा है. इन्हें इस कार्य के लिए 1000 रूपये के हिसाब से अधिकतम 25 क्लास दी जाती है. और जिसे कभी भी प्रोफेसर की जरूरत नहीं है के हिसाब से हटाया जा सकता है. इन्हें एक अनऔपचारिक गम्भीर हिदायत दी जाती है कि बेटा तुम तो अब मुंह मत खोलना नहीं तो जो मिला है उसे हमें छिनने में कोई ज्यादा समय नहीं लगेगा.

03. विशिष्ट बेरोजगार
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ये उपरोक्त दोनों श्रेणी से भिन्न मामला है, पर इस भिन्नता को प्राप्त करने के लिए आपको किसी तरह एडहाक प्रोफेसर के रूप में कम से कम एक साल काम करना होगा. उसके बाद आप इस तबके के हकदार हो जाते हैं. आपकी योग्यता का लोहा हर कोई मानने लगता है. ये भी कहा जा सकता है कि आपके योग्यता की वजह से ही सारे साक्षात्कार को रोक दिया जा सकता है. साक्षात्कार चाहे परमानेन्ट का हो या अतिथि प्रवक्ता का दोनों आपके लिए टाल दिया जाता है, जिसमें हर प्रकार के बेरोजगारो ने अपने हजारों रुपये बिना मतलब डूबा दिया मान लेते हैं.

04. मलाईदार बेरोजगार
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इन सबके बीच एक मलाईदार बेरोजगार श्रेणी भी है, जो इस बेरोजगारी योजना में परमानेन्ट से भी ज्यादा सम्पन्न है. यह उन सर्व सम्पन्न बहुआयामी, अति कर्मठ लोगों की श्रेणी है, जो एक साथ एडहाक, गेस्ट, नोन कॉलेजियेट, SOL, IGNOU सभी को पढाते हैं. साथ में इनके राजनीतिक चमत्कार पर आप सवाल उठा ही नहीं सकते क्योंकि इसी वजह से तो ये हैं. नहींकौन सप्ताह में सात दिन और हर छुट्टी के दिन भी इतना पढा सकता है. हर तरह के बेरोजगार का एक ही प्रश्न होता है – अम्मा सर इतना पढाते हैं तो पढते कब होंगे. सवाल तो सवाल है, आपको अगर जवाब मिले तो बताईयेगा जरूर…

(सवाल इसका नहीं कि यह बेरोजगारी क्यों है और यह कब, कैसे व किसके कारण शुरू हुई ? सवाल ये है कि क्या हमेशा इसे ही चलाते रहोगे. यार एडहाक को ही लगाना है तो सभी एडहाक को परमानेन्ट कर दो. वो इतना प्रभावशाली हैं कि उन्हें हटाना सम्भव नहीं है. उनके कारण परमानेन्ट इन्टरव्यू करवाना गलत है, तो प्लीज़ उन्हें पूरा का पूरा परमानेन्ट करा दो, लेकिन ये पूरी ईमानदारी से घोषणा करो कि अगली बार जब भी असिस्टेन्ट प्रोफेसर की नियुक्ति हो तो परीक्षा होगी. हमें समझ भी नहीं आता और हम समझना भी नहीं चाहते हैं कि आप किस प्रकार से पांच-छ्ह मिनट के केवल साक्षात्कार में भावी असिस्टेन्ट प्रोफेसर की तलाश कर लेते हैं. प्लीज़ उसके बाद जरूर आप एक्जाम कन्डक्ट कराओ, इसलिए भी नहीं कि नियुक्ति अच्छी ही होगी, बल्कि इसलिए कि अपने योग्यता पर लोगों को विश्वास रहेगा और आप पर कोई सवाल नहीं उठा पायेगा.
#DU #DUTA #Ad_hoc #Guest #Assistant_Professor #Unemployment #SOL #School_of_Open_learning #Non_Collegiate #बेरोजगारी_डायरी_01

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क्या हमने इंसानियत बेच खाई है

जैसे लगता है कि अब कोई भी खबर हमें अचम्भित नहीं करता. और न ही हमारे जीवन में कोई विशेष अर्थ रखता है. तो क्या अब लगता है कि हम तटस्थ भाव से ही अपने जीवन को जीते रहेंगे. क्या अब सामाजिक जीवन की खामियाँ हमारे परिवार, सगे सम्बन्धियों को न छू पायेगी.
ऐसा सोच पाना कहाँ तक उचित है? कहां तक हम इन बातों से मुंह मोरते रहेंगे. क्या इतना भर कह देना कि यह मर्द का, मुस्लमान का, हिन्दू का, दलित का, अगरा का, पिछड़ा का काम है. और बस इस बात से किसी का मुंह बंद कर दिया जायेगा.
नहीं कभी नहीं. यह एक इंसान का काम है जिसने पूरी इंसानियत को शर्मसार किया है. हैवानियत जिसके अंदर आ जाए वो किसी धर्म का कैसे हो सकता है. और कैसे एक आदमी की सजा पूरे धर्म, समाज को दी जायेगी. कैसे एक व्यक्ति मन्दसौर, कठुआ, उन्नाव, दिल्ली को शर्मसार कर सकता है. जो भी व्यक्ति इस तरह का घृणित काम को अंजाम देता है वो हैवानियत का शिकार है. और ये हैवानियत जगह, धर्म, जाति से नहीं आती बल्कि मानसिकता से आती है. इस तरह की मानसिकता कैसे समाप्त हो हमें इसके लिए कुछ करना होगा.
हमें सही से सोचना होगा कि हमारे अंदर, हमारे परिवार में, हमारे समाज में इस तरह की नियत न पैदा हो. उसके लिए निरंतर लड़ते रहने की जरूरत है. ये कोई धर्म, स्कूल, सत्ता प्रतिष्ठान की किताबें नहीं सिखायेगी बल्कि खुद से इसे सिखना होगा. अगर हम ये नहीं कर पाये तो अभी बस ब्लेम कीजिए पर अगली बारी आपके हमारे घर की होगी. अगली बेटी, बहन, बहू, चाची, नानी आपकी और मेरी होगी…
#Divya #MandsaurRape #MP

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बातें-मुलाकातें

कभी मिलने को तड़पते थे
शाम ढल जाए तो रात के गुज़रने को मचलते थे

समय बीतता गया
सुबह, शाम और रात का दायरा यू बढ़ता गया

अब ऐसा लगता है
तुमसे बात तो होती थी

दिन-महिनों-साल में
एक दो ही सही मुलाकात तो होती थी…
-कार्तिकेय

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राजघाट बंद

चुँकि #गांधी_के_राम अलग थे और #हिन्दुत्व_के_राम अलग. इसीलिए राजघाट को बंद कर गांधी स्मृति और दर्शन समिति में #राम_मंदिर_निर्माण_की_बैठक की गई. यार क्या फलसफे है तुम्हारे…
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गांधी क्या है केवल शब्द, विचार या इंसानियत की वो पहचान जो समय-समय पर हमारे होने को कचोटता है. यह एक भाव पैदा करता है कि केवल भारतीयता ही नहीं दुनियावी हकीकत भी जिन्दा है. जिनके होने का एहसास कभी डिगता नहीं और न ही किसी के खात्मा को अपना मंजिल बनाता है. उनकी हत्या भले ही सत्तर साल पहले की गई हो. लेकिन आज भी उनके नाम, विचार और एहसास को मारने की रवायत समय-समय पर जारी है. यह सिलसिला कभी इंसानी देह को ख़त्म करने में तो कभी इंसानी वजूद को हिला देने में लगातार लगा है पर हुआ क्या सभी के सामने है.
सच पूछा जाए कि इन सबसे हुआ क्या? क्या किसी संस्थानिक प्रयास या धार्मिक प्रपंच का शिकार वो हो पाये? क्या इतनी ही कमजोर थी उनकी नीव. नहीं! मेरी समझ तो बस इतनी ही कहती है कि न ये पहले संभव था जब 1935 से लगातार प्रयास के बाद यह सम्भव हो पाया, न ही 1942 के बाद, न ही 1947 के बाद और न ही 30 जनवरी 1948 के 5 बजकर 17 मिनट के बाद ही. भले ही उस समय देह ने साथ छोड़ दिया हो पर इतना तो जरूर हुआ कि इंसानियत की आवाज़ जो गांधी में जब्त थी वो और भी मुखर होकर हर किसी के अंदर समा गई जो समय-समय पर हम-आपके बीच हुंकार मारती है.
भले ही आज कल का दो दिना #राजघाट_बंद किसी के सत्ता प्रतिष्ठान पर काबिज होने का संकेत मात्र हो. पर मैं तो इतना ही कहना चाहुन्गा – “ऐसी घटनाएं बार-बार हमारे अंदर के गांधी को जिन्दा करने के लिए ही काफी है.” सच में राजघाट वो जगह है जहां लोग जाकर गांधी के रूह से खुद का साक्षात्कार करते हैं. जो हमारे लिए हमारे अहिंसक होने को और भी प्रबल बनाता है. यह जगह अपने विरोधियों के बीच जाकर या बुलाकर एक बार फिर बात करने का साहस देता है. एक उम्मीद बांध देता है कि एक बार नहीं बल्कि बार-बार सत्य से साक्षात्कार किया जाए. उसके असहमति पर विचार कर वो रास्ता ईज़ाद किया जाए कि वो मुझे समझ पाये और मैं भी उसे उतना ही समझ पाऊ. हम वैसा नहीं कि किसी के नफरत का प्रतिकार उसी के रूप में कर सकें बल्कि हम वैसे हैं जो उसके अंदर के नफरत को कम करने के लिए जो भी कोशिश हो वो कर सकेंगे.
भले ही राजघाट पहली बार दो दिनों के लिए बंद कर दिया गया हो पर मुझे राजघाट की हवा में दिखाई देता है कि वो मानो कह रही हो कि “भाई आप अपना मंथन बड़े ही शान से करो और उसमें हमारे कारण कोई कमी न आये. तुम भलीभान्ति सोचो, समझो और वही करना जो तुम्हारे लिए भी उतना ही उचित हो. इंसान, धर्म और समय जरूर आते-जाते रहते हैं लेकिन अगर खुद का सच्चे और सकारात्मक होने का विश्वास उठ गया तो तुम क्या तुम्हारा कोई भी कुछ नहीं कर पायेगा…”
-कार्तिकेय

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हैप्पी वेलेन्टाइन वाला महाशिवरात्रि का दिन

प्यार का मौसम है और दिल भी जवान है. बेखुदी उनकी है जिनके कारण गली-गली में आज गदहे भी पहलवान हैं. कोई कहता है इसे माँ-बाप के लिए छोड़ दो. अरे भइया माना तेरी बात कि मां-बाप के लिए भी कोई दिन होना चाहिए. कोई दिक्कत नहीं. पर अपने शादी के सालगिरह को उत्सव के रूप में मनाओ न किसने मना किया है. हम सब को तो इससे निजात दो…
वो कहते हैं – “ये बच्चों और युवाओ की बाबत नहीं.”
दिल कहता है – “माना बच्चों के प्यार के अपने रंग होते हैं. पर मैं और तुम अब बच्चे भी तो नहीं रहे. बच्चे न ही उम्र से न ही अब उम्मीद का बचपना हमारे बीच हैं. हम सोच सकते हैं और चाह सकते हैं अपने जुनून और जुस्तजू में एक दूसरे को.”
माना चाहत की रोटी पकौड़ी तलने से पूरी नहीं होगी. पर क्या करें. उम्मीद अपने बाहों पर आज भी उतना ही है. सच कहुँ तो उम्मीद का दामन तेरे होने से और भी बढ़ जाता है. बेरोजगारी और बदकिस्मती का अमली जामा केवल समय का फेर नहीं अब. ये तो जिंदगी के संगी-साथी है. इनका रिश्ता पुराना तो नहीं लेकिन जवानी से बुढ़ापे की दहलीज़ पर जरूर घसीटने वाला है.
मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाने के लिए ससुरजी को जो जोब का तमगा चाहिए वो इस जनम में अधुरा सा लगता है. तो क्या इस इंतज़ार में अपने इस समय को बर्वाद किया जाए.
शिवजी के असीम अनुकम्पा जरूर इस बार बाबा वेलेन्टाइन डे पर आई. लेकिन किस्मत ने बुरा मान लिया. छुट्टी का दिन करा कर हमारा चुपके से मिलना भी शिवजी को नागवार गुजरा. अरे बम भोले बाबा हमारी खुशी का ये सालाना जलसा भी तुझसे देखा न गया.
अब क्या कहुँ. कहने को बहुत कुछ है पर जिसे मैं बिना कहे आंखों ही आंखों में समझा सकता था वो पल ही नहीं कि हम आपस में बैठ कर एक-दूसरे के आंखों को पढ़ सकते. सब भोले बाबा की गलती है. यार तेरह और चौदह दो दिन आपकी शिवरात्रि और हमारा इस एकदिना प्रेमालाप का भी बंटाधार. कितने निष्ठुर हो गए तुम बाबा. क्या कहुँ जानू तुम अब न समझ पाओगी क्योंकि बाबा भी हमें न समझ पाये.
क्या कहुँ – हैप्पी वेलेन्टाइन डे या महाशिवरात्रि की बधाई या मातृ-पितृ पूजन दिवस की शुभकामनाएँ. कुछ न ही समझ आता है और न ही अब मैं समझना ही चाहता हूँ…

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गांधी 70

राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक आकाओं को
हमने घरियाली आहें भरते देखा है.
हाँ ! अपने अंदर के गांधी को पल-पल मरते देखा है…

उम्मीद के मोती सर से सरकते
पैरों पे टपकते देखा है.
हाँ ! अपने अंदर के गांधी को पल-पल मरते देखा है…

सांप्रदायिक उन्माद को फलते-फूलते
इंसानियत को दिन-रात तड़पते देखा है.
हाँ ! अपने अंदर के गांधी को पल-पल मरते देखा है…

खुदगर्जी के पागल-दौड़ सजाते देखा है
हमने बेशर्मी का उफान उबलते देखा है.
हाँ ! अपने अंदर के गांधी को पल-पल मरते देखा है…
-कार्तिकेय