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कैसा दुःख ?

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दुःख है, 

अपनी परम्पराओं के टूट जाने का. 

दुःख है, 

अनायास वर्चस्व के छीन लिए जाने का. 

दुःख है, 

सबके समान हो जाने का. 

दुःख है, 

दकियानूसी 

परंतु अपनी वर्चस्ववादी पारम्परिक विरासत 

ब्राह्मणवाद के मर जाने का.

दुःख है, 

हाँ! बहुत दुःख है!

औरों के समझदार हो जाने का.

                                 – कार्तिकेय

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सवाल

जिंदगी बार-बार बेचैन करती है और हर बार-बार खड़े हो जाते हैं कई नए सवाल मैं उन सवालों के गह में जाना चाहता हूँ कुरेदना चाहता हूँ उनका जवाब इस तरह मैं औरों को नहीं, खुद को परखना चाहता हूँ अपनी उम्मीद का दामन थाम मैं जुगनू बन जाना चाहता हूँ… -कार्तिकेय Follow my wr #instawriters #writersofinstagram #writersofig #writersofindia #igwriters #igwritersclub Follow my writings on https://www.yourquote.in/rajeevkartikeya #yourquote

कविता

किसी भी सोच को मारने को
कोई मौत मुक्कमल नहीं होती
जिन्दा लोग मिट्टी में दफना दिये जाने पर भी
उतने ही जिन्दा रहते हैं –
अपने सोच में,
अपने कामों में,
अपने मिशन में.
भले उनके चले जाने पर कारवाँ टूटता हो
लेकिन वज़ूद जिन्दा रहता है,
वो एहसास जिन्दा रहता है,
और कारवाँ फिर एक बार आगे बढ़ता चलता है
सलाम साथी सफ़दर…
-कार्तिकेय

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जाती है बहारें जाने दो
ये नया साल आ जाने दो.

उम्मीद नई
और
जोश नया अब लाने दो
ये नया साल आ जाने दो.

कुछ चाल बेढंगे हो गए
बातें भी पुरानी हो चली
इन यादों से अब नई ईबारत लाने दो
ये नया साल आ जाने दो…
-कार्तिकेय

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गूदड़ बस्ती – प्रज्ञा

“जिंदगी अपने भीतर अनेक कहानियाँ लिए चलती हैं. जिनके किरदार कभी ठून्ठ में कोंपल रच देते हैं तो कभी अपनी गुमनामी में जीकर ऐसे निकल जाते हैं मानो वो कभी थे ही नहीं.”
ये अल्फाज़ कितने सच हैं जिसे मासुमियत के साथ उपन्यास की शुरुआत में सुरेन्दर कहता है. वो अपने जीवन की उँचाइयों के शिखर पर है. पढाई-लिखाई ने उसके जिंदगी के मायने बदले हैं. इस बदलाव में उसे क्या-क्या सुनना और झेलना पड़ा उसका ही दस्तावेज है ‘गूदड़ बस्ती’. उंच-नीच की जातिगत सामाजिक मर्यादा कब किसे ठेस पहुँचाती है ये आज भी अनायास स्कूलो, कॉलेजो, दफ्तरो और समाज के विभिन्न प्रतिष्ठानो में आमतौर पर यू ही देखा जा सकता है. कब धर्म के दिखावे की अधार्मिक छवि लोगों के शोषण और व्याभिचार का हिस्सा बन जाती है कुछ पता ही नहीं चलता. कब चिकित्सकीय सूझबूझ के न होने के कारण डाक्टर अपने मरीज को मौत के मुंह में धकेल देता है नहीं पता चलता. कब भीड़ एक-दो व्यक्ति के दोषों को पुरी कौम और मानवता का शिकार बना जाती है कुछ समझ नहीं आता. और ये सब होता हुआ अनायास ही लोग देखते रहते हैं. वे इंतज़ार कर रहे होते हैं कि शायद अब यह ठीक हो जाए. कब इज्जत का जोश उन लोगों के सर सवार हो जाता है पता ही नहीं चलता. पता ही नहीं चलता कि जिन्होंने जिंदगी भर खुद इज्जत की धज्जियां उड़ाई हो और वो ही अपनी बहु-बेटियों पर पाबन्दियो का एक घेरा बना डालते हैं. यहाँ तक कि अपनी जातिगत सामाजिक स्थिति को वर्चस्व और दिखावे की घिनौनी चाल में फंसा खुद को हिंसा के लिए प्रेरित करते हैं. भाई के गँवारपन के कारण पढाई-लिखाई का हर वो पैमाना धरा का धरा रह जाता है और उस निरीह लड़की का पता ही नहीं चलता. पता नहीं चलता कहाँ गई वो और क्यों गयी? किस बात की सजा मिली उसे लेकिन हाँ उस लड़की की माँ को इतना जरूर लगता है कि उसका भाई जहाँ गया होगा. वही मिलेगी वो.
लगता है कई फिल्मे देखी है मैने कई दृश्य उभरे हैं मेरे आंखों के सामने कई परछाईयाँ नजर आई है मुझे लगा है कितनी चीज़े होती हैं संसार में जिसका लोग यूहि शिकार हो जाते हैं.
न जाने और कितने सवाल है जिसे अपनी रचनात्मकता से उपन्यासकार ने अपने इस उपन्यास में पिरोया है. मैम आपके कारण आज एक सामाजिक जीवंततापूर्ण इस ‘गूदड़ बस्ती’ में मैं प्रवेश कर पाया. बहुत कुछ जान पाया जो सच तो था लेकिन उसे कभी उकेरा नहीं गया था. आपका बहुत बहुत धन्यवाद कि साल के जाते-जाते एक अद्भुत रचना से हम साक्षात्कार कर पाये…

-कार्तिकेय

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हाँ! मैं बाल मजदूर हूँ

क्या साहब जरा जल्दी बताना
मुझे मजूरी मिलेगी

नहीं…
क्यों साब, क्यों नहीं?

अरे माई-बा!
आपके घर का सारा काम
बर्तन माँजना, झाड़ू-पोंछा देना
कूड़े को सही जगह फेंकना
कपड़े साफ करना
समय-समय पर आपके
सर और शरीर की मालिश
तथा
जरूरत पड़ने पर
आपकी यौनापूर्ति भी करूंगा.

क्यों साब अब तो मान जाओ?
इस मल्टी वर्क सर्वेन्ट
को रख
अपनी सारी इच्छापूर्ति
को मूर्त रुप दो.

अरे भाई! चिंता की कोई बात नहीं
ज्यादा पैसे की
कोई चिंता न कर
मुझे तो बस इतना दे दे
ताकि आगे जिन्दा रह सकूँ.

अब तो मान जाओ!
अगर इससे मजूरी के बदले
कोई और आरजू हो
वो भी बता दो,
नहीं साब कोई समझौता नहीं.
तुम्हारी सब शर्तों को मान
मुझे अब
तुम्हारे यहाँ या किसी और के पास
मजूरी तो करनी ही है.
क्योंकि,
हमें भी परमोशन चाहिए
अपना भी कोई स्तर माँगता है.
भिखारी से ऊपर बाल मजूरी को
हम अच्छा जानता है.

साब! मुझमें खानदानी नुस्खा है या नहीं
यह नहीं बता सकता
पर गारंटी देता हूँ
कि आपके सभी
कामों को
ठीक ढंग से करूंगा.

क्यों साब! अब क्या हुआ
लगता है आप भी
‘झुग्गू कुत्ता करोड़पति’ देख
ये तो नहीं सोच रहे
कि मेरा नौकर
अगर एक दिन
करोड़पति बन गया तो
तुम फिर अपने आस-पड़ोस
व रिलेटिव को क्या बताओगे.

अरे साब! तुम भी क्या
इस फिल्मी दुनिया के चक्कर में पड़ते हो,
‘स्लमडॉग मिलेनियर’ और इस
फटेहाल डॉग में
तुझे कोई अन्तर नहीं लगता.

क्यों इस छोटे से दिमाग को
कूड़े में झोंक रहे हो साब.
मान लिया कि वैसा ‘चमत्कार’
हो भी गया तो क्या हुआ
‘स्वर्ग’ फिल्म के गोविंदा की तरह
कभी तेरे मुसीबत से तुझे जरूर ऊबारुंगा.

यह किसी बिजनेसमैन या पॉलिटीशियन
का वादा नहीं
किसी के भूखे पेट का
आत्मिक आगाज़ है.

अब क्या साब! अब तो मान जाओ
लगता है अब तुझे
एन.जी.ओ. और सरकार के
चाइल्ड लेबर विरोधी संगठन की चिंता है.

अरे भइया! अगर वो सही में
चिंता करने लगेंगे तो
उनके घर के कामों को
अन्ज़ाम दे रहे
छोटे बच्चों की समस्या
स्वयम् ना उन्हें पहले दबोच खायेगी.

उन्हें और सबको तभी मज़ा है
जब यह या कोई समस्या
समस्या बनी रहे.
वे चिल्लाते रहे
बस इसीलिए
कि उनके नाम व बड़े-बड़े फोटो
कभी पेपर तो कभी टी.वी. चैनल
पर आती रहे
और इस प्रकार
चिरकाल तक
पॉपुलस के पेड़ की भाँति
पॉपुलर होते रहें.

अरे साहेब! अब तो रख लो
इस अनाथ-नीच को
एक आश्रय दे दो
ताकि
अपने जीवन के नींव को ईंट दे सकूं
ताकि
भिखारी से मजदूर
फिर
मजदूर से आदमी बन सकूं…

-कार्तिकेय

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वो खौफनाक रात

क्या तुमने कभी जिंदगी को इतने शिद्दत से महसूस किया है ?

हाँ! बड़ी बेदर्दी के साथ और वो भी आज
जब पुरी रात
खुद की छटपटाहट को मैंने
खुद अपने अंदर महसूस किया.

देखा है बंद कमरे में कैसे भोपाल बना जा सकता है.
देखा है कैसे
मौत की दस्तक में अपने बगल में लेटे लोगों को
बार-बार जगा कर तसल्ली ली जाती है.

हाँ! देखा है कैसे एक सामान्य रात
एक भयावह रूप ले लेती है.
कैसे सामान्य सी हवा जब जहरीली बन जाती है
कैसे जिन्दा रहने का सामान्य सा काम भी
सामुहिक मौत का सुगबुगाहट बन जाता है

हाँ! मैंने किया है सुबह तक इंतजार
ताकि अगले दिन कही भागा जा सके
ताकि खुद को रतजगा न होना पड़े
ताकि सांस लेने की शुद्ध आजादी बची रहे…
-कार्तिकेय

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सोशल मीडिया की अनसोशल बातें

बड़ा बावेला मच जाता है हर बात पर. किसी की अपनी समझदारी है और उतना ही अपना तर्क. आज कल हम भारतीय जितना अधिक समझदार हो गए हैं. उतने ही अधिक संस्कारी, पारम्परिक, इतिहासजीवी. हर बात पर हम तर्क संगत और बुद्धिजीवी बनने का स्वर्णिम भूत खोज लेते हैं. और हर किसी को इस पैमाने पर खदेड़ने लगते हैं. और बताने लगते हैं अपने साइन्टिफिक पारम्परिक हथियार. वहां हर कुछ पहले से ज्यादा तयशुदा और तार्किक नजर आने लगता है. बात आज की ही है. बहुत हो हल्ला हो रहा है. #सिन्दूर की तार्किकता, विश्वास के मनभावन विषय पर. कोई अपने तर्को की ठेकेदारी में इसे तार्किक बता रहा है, तो कोई साइन्स की घुट्टी पिला कर साइन्टिफिक, तो कोई परम्परा का रखवाला पारम्परिक.

मेरे एक फेसबुकिया मित्र ने भी पूछा भाई तुम्हारी राय क्या है?

मैंने कहा भाई आप राय पूछ रहे हो और उसमें भी मेरी. मैं असमंजस में था कि मुझसे क्यों? मैं तो सिन्दूर लगाता नहीं. मेरे राय से क्या होता है.

उसने कहा जब सब इस महाभारत में पीले पड़े हैं. तुम भी बता दो.

मैंने कहा मेरी राय जानना है तो चंदन, चुटिया, धोती-कुर्ते पर पूछ लो. और अगर पुछोगे इन पर तो एक ही जवाब है चाहे पहनने-ओढने की बात हो अथवा फैशन का तो वो मेरा नितांत अपना दृष्टिकोण है कि मैं क्या पहनू क्या, लगाऊ अथवा क्या नहीं. यह मेरी अपनी सोच है और इसके लिए मैं स्वतंत्र हूँ.

और रही बात औरतों की तो ये तो भइया किसी को व्यक्तिगत रूप से लगाने का मन है तो लगाये या न लगाये. अगर ये समाज पुरुषों की भांति उन्हें भी इतना छूट देता है तो सही है. और अगर नहीं छूट देता तो तुम्हारा सामाज अथवा कोई परम्परा ही नहीं पूरा का पूरा सामाजिक ढांचा ही अन साइन्टिफिक और पुरुषवादी है.

उसने कहा तुम कैसी बात कर रहे हो.

मैंने कहा भाई पता नहीं. लेकिन हाँ यही संवैधानिक भी है और न्यायसम्मत भी. मुझे ज्यादा समझ नहीं आता लेकिन इतना जरूर समझता हूँ. कि बराबरी का हक और बराबर दिखने की चाहत ने ही आपके चंदन को मिटा दिया है और आपकी चुटिया अब आपके बालों में कहीं और गुम हो गई है. तो औरत अगर सिन्दूर करने न करने की बात कर रही है तो उसमें गलत क्या. वो उनका व्यक्तिगत सोच है और उन्हें इस मुद्दे पर खुलकर बातें करनी चाहिए…
-कार्तिकेय