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कैसा दुःख ?

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दुःख है, 

अपनी परम्पराओं के टूट जाने का. 

दुःख है, 

अनायास वर्चस्व के छीन लिए जाने का. 

दुःख है, 

सबके समान हो जाने का. 

दुःख है, 

दकियानूसी 

परंतु अपनी वर्चस्ववादी पारम्परिक विरासत 

ब्राह्मणवाद के मर जाने का.

दुःख है, 

हाँ! बहुत दुःख है!

औरों के समझदार हो जाने का.

                                 – कार्तिकेय

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हैप्पी वेलेन्टाइन वाला महाशिवरात्रि का दिन

प्यार का मौसम है और दिल भी जवान है. बेखुदी उनकी है जिनके कारण गली-गली में आज गदहे भी पहलवान हैं. कोई कहता है इसे माँ-बाप के लिए छोड़ दो. अरे भइया माना तेरी बात कि मां-बाप के लिए भी कोई दिन होना चाहिए. कोई दिक्कत नहीं. पर अपने शादी के सालगिरह को उत्सव के रूप में मनाओ न किसने मना किया है. हम सब को तो इससे निजात दो…
वो कहते हैं – “ये बच्चों और युवाओ की बाबत नहीं.”
दिल कहता है – “माना बच्चों के प्यार के अपने रंग होते हैं. पर मैं और तुम अब बच्चे भी तो नहीं रहे. बच्चे न ही उम्र से न ही अब उम्मीद का बचपना हमारे बीच हैं. हम सोच सकते हैं और चाह सकते हैं अपने जुनून और जुस्तजू में एक दूसरे को.”
माना चाहत की रोटी पकौड़ी तलने से पूरी नहीं होगी. पर क्या करें. उम्मीद अपने बाहों पर आज भी उतना ही है. सच कहुँ तो उम्मीद का दामन तेरे होने से और भी बढ़ जाता है. बेरोजगारी और बदकिस्मती का अमली जामा केवल समय का फेर नहीं अब. ये तो जिंदगी के संगी-साथी है. इनका रिश्ता पुराना तो नहीं लेकिन जवानी से बुढ़ापे की दहलीज़ पर जरूर घसीटने वाला है.
मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाने के लिए ससुरजी को जो जोब का तमगा चाहिए वो इस जनम में अधुरा सा लगता है. तो क्या इस इंतज़ार में अपने इस समय को बर्वाद किया जाए.
शिवजी के असीम अनुकम्पा जरूर इस बार बाबा वेलेन्टाइन डे पर आई. लेकिन किस्मत ने बुरा मान लिया. छुट्टी का दिन करा कर हमारा चुपके से मिलना भी शिवजी को नागवार गुजरा. अरे बम भोले बाबा हमारी खुशी का ये सालाना जलसा भी तुझसे देखा न गया.
अब क्या कहुँ. कहने को बहुत कुछ है पर जिसे मैं बिना कहे आंखों ही आंखों में समझा सकता था वो पल ही नहीं कि हम आपस में बैठ कर एक-दूसरे के आंखों को पढ़ सकते. सब भोले बाबा की गलती है. यार तेरह और चौदह दो दिन आपकी शिवरात्रि और हमारा इस एकदिना प्रेमालाप का भी बंटाधार. कितने निष्ठुर हो गए तुम बाबा. क्या कहुँ जानू तुम अब न समझ पाओगी क्योंकि बाबा भी हमें न समझ पाये.
क्या कहुँ – हैप्पी वेलेन्टाइन डे या महाशिवरात्रि की बधाई या मातृ-पितृ पूजन दिवस की शुभकामनाएँ. कुछ न ही समझ आता है और न ही अब मैं समझना ही चाहता हूँ…

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गांधी 70

राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक आकाओं को
हमने घरियाली आहें भरते देखा है.
हाँ ! अपने अंदर के गांधी को पल-पल मरते देखा है…

उम्मीद के मोती सर से सरकते
पैरों पे टपकते देखा है.
हाँ ! अपने अंदर के गांधी को पल-पल मरते देखा है…

सांप्रदायिक उन्माद को फलते-फूलते
इंसानियत को दिन-रात तड़पते देखा है.
हाँ ! अपने अंदर के गांधी को पल-पल मरते देखा है…

खुदगर्जी के पागल-दौड़ सजाते देखा है
हमने बेशर्मी का उफान उबलते देखा है.
हाँ ! अपने अंदर के गांधी को पल-पल मरते देखा है…
-कार्तिकेय

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अफवाहों की दलिलों से पटी पड़ी जनता

अफवाहों के दलिलों से पटी पड़ी जनता
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क्या समझ पायेगी?
असहमति की बुनियाद को.

क्या समझ पायेगी?
बिना भेड़चाल का भी अपना वज़ूद होता है.

क्या समझ पायेगी?
हर किसी का अपना मत व अपनी मानसिकता होती है.

क्या समझ पायेगी?
केवल सांस छोड़ने और लेने को ही जिन्दा रहना नहीं कहते हैं.

क्या समझ पायेगी?
जिन्दा रहने के लिए सर्वमान्य, सार्वभौमिक विश्वास की भी जरूरत होती है.

समझ पायेगी कि वो विश्वास क्या है?
जो हम सभी को एक धागे में पिरोता है.

समझ पायेगी कि वो विश्वास क्या है?
जो हमें गणतंत्र रखता है.

क्या वो उस संवैधानिक विश्वास की रक्षा आज कर पायेगी?
अगर हाँ!
तो आपको तहे दिल से गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई.
अगर नहीं…
तो पहले उन सर्वमान्य, सार्वभौमिक अधिकारों की रक्षा के लिए सामने आयें. नहीं तो आप हम केवल बधाइयाँ ही बांटते रह जाएंगे. और देश बद से बदतरी की तरफ बढ़ता चला जायेगा. कही करणी सेना बनेगी तो कही न्यायालय और मीडिया की आवाज़ कुचल दी जायेगी और तो और विकास का ढिन्ढोरा केवल फेंकन चचा के चर्चे का हिस्सा भर रह जायेगी.
-कार्तिकेय
चित्रांकण : Aparajita Sharma

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सवाल

जिंदगी बार-बार बेचैन करती है

और

हर बार-बार खड़े हो जाते हैं कई नए सवाल

मैं उन सवालों के गह में जाना चाहता हूँ

कुरेदना चाहता हूँ उनका जवाब

इस तरह मैं औरों को नहीं,

खुद को परखना चाहता हूँ

अपनी उम्मीद का दामन थाम

मैं जुगनू बन जाना चाहता हूँ…

-कार्तिकेय

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रामजी चायवाले और चचा पकौड़ी वाले

आजकल पारम्परिक विरासतवान समझदार चारों ओर छाये हुए हैं. उनके समझदारी का मंज़र बस ये है कि उन्हें एक बार समझदारी की घुट्टी पिलाई जाती है. और एक बार पी लिए तो लाईफटाईम के लिए वो रिचार्ज़ हो जाते हैं. ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है और वे हर तरह के सामाजिक व्यवस्था में अनायास ही मिल जाते हैं. उनके इस समझदारीे से अकादमिक पढाई-लिखाई और सामाजिक सुझबुझ का कोई लेना-देना नहीं है.

आजकल इन्होंने डिबेट की नई संस्कृति पैदा की है. जिसमें किस तरह चचा (राजनीतिक चचाजान) के गलत को तार्किक ढन्ग से सही साबित किया जाए उसका प्रयास और अपना ऐतिहासिक सहयोग जारी रखा जाता है. इस तरह साहसिक उपलब्धि का ढिन्ढोरा पिटा जाता है.

कल ऐसे ही एक मित्र से मुलाकात हुई. मुलाकात अच्छी रही. वक्ता तो अब वो पेशेवर हो गए हैं. उन्होंने तकरीबन तीन साल अपने लेफ्ट को राईट करने में लगाया है और अब उनका मानना है कि वो बिल्कुल राईट हैं. उनका अपना तर्क है – “यार राजनीतिक टीम-टाम जो भी हो घर से जब फोन आता है कि नौकरिया कब परमानेन्ट होगा तब रामजी के मंदिर के अलावा कहाँ कुछ दिखाई देता है.”

मैने कहा – “अरे भाई साब! आप तो घर से फोन आते ही एलेक्शन मोड में चले जाते हो. लोग एलेक्शन आते ही जैसे राम मंदिर बनाना शुरू कर देते हैं वैसे ही तुम भी.”

“अरे नहीं भाई. क्या कर सकते हैं?”

मैने कहा – “भाई साब आजकल तो रोजगार का बाजार गर्म है. आपको कुछ रोजगार नहीं मिला क्या परमानेन्ट वाला.”

वो हंस दिए…

मैंने कहा – “अरे भइया पिछले सात-आठ महीने में मुद्रा योजना के तहत 4 लाख करोड़ रुपये लोन मिला है. वो भी दस करोड़ लोगों को जिसमें पहली बार तीन करोड़ लोगों को उससे रोजगार मिला है. इतना तो लोग परमानेन्ट हुए. अब क्या चाहिए. आप भी उसी में देख लेते. अपना काम और आप हो जाते स्वरोजगार.”

उन्होंने कहा – “भाई तू तो मसखरी मत कर.”

मैने कहा – “भाई आप तो चायवादी राजनीतिक संस्कृति और पकौड़ा की आर्थिक संस्कृति को भारतीय जन मानस के उद्धार का उपदेश दे रहे हो और खुद के लिए कह रहे हो मजाक मैं कर रहा हूँ. धन्य हो जी आप.
एक बात जाननी थी ये चाय और पकौड़ी की जिस संस्कृति का आप प्रचार-प्रसार कर रहे हो रामजी न करें कि आप भी रामजी चायवाले और चचा पकौड़ी वाले बन बैठो तो कैसा लगेगा आपको.”

सवाल मेरे थे. जवाब में उनके मुंह से एक प्यारी भक्तिमय गाली थी.

मैंने जाते-जाते कहा – ‘भारत माता की जय”
-कार्तिकेय

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सवाल

जिंदगी बार-बार बेचैन करती है और हर बार-बार खड़े हो जाते हैं कई नए सवाल मैं उन सवालों के गह में जाना चाहता हूँ कुरेदना चाहता हूँ उनका जवाब इस तरह मैं औरों को नहीं, खुद को परखना चाहता हूँ अपनी उम्मीद का दामन थाम मैं जुगनू बन जाना चाहता हूँ… -कार्तिकेय Follow my wr #instawriters #writersofinstagram #writersofig #writersofindia #igwriters #igwritersclub Follow my writings on https://www.yourquote.in/rajeevkartikeya #yourquote

कविता

किसी भी सोच को मारने को
कोई मौत मुक्कमल नहीं होती
जिन्दा लोग मिट्टी में दफना दिये जाने पर भी
उतने ही जिन्दा रहते हैं –
अपने सोच में,
अपने कामों में,
अपने मिशन में.
भले उनके चले जाने पर कारवाँ टूटता हो
लेकिन वज़ूद जिन्दा रहता है,
वो एहसास जिन्दा रहता है,
और कारवाँ फिर एक बार आगे बढ़ता चलता है
सलाम साथी सफ़दर…
-कार्तिकेय

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